
Masihi Geet Sangrah
### मण्डली (The Communion of Saints)
#### 182 (१८२)
*“Tis a pleasant thing to see.”*
*7. 7. 7. 7. Dijon or Weber.*
१ क्या मनोहर भली बात- जहां भाई हाथ में हाथ ।
ले चलते और सब एक चित- ख्रीष्ट की आज्ञा के निमित ।।
२ तब तो हर एक उत्तम दिन- शान्ति आनंद और कल्याण ।
ओस के तुल्य उतरेगा- वहां आशिष बसेगी ।।
३ प्रभु यीशु प्रेम से पूर- प्रेम से हमको कर भरपुर ।
जिससे जग में हो प्रकाश- कि हम सचमुच तेरे दास ।।
४ पिता और पवित्रआत्मा- तेरे संग एक है सदा ।
वैसा प्रेम के बंधन में- हमको भी तू एक कर दे ।।
५ हर एक मन में प्रेम सुलगा- प्रेम में मन से मन गठा ।
प्रेम हम सब में मरने लों- सफल सिद्ध निष्कपट हो ।।
६ एक हो दूसरे के आधीन- होवे दीनता कपटहीन ।
मंदा मृदु और सदय- क्षमावान और धीरसमय ।।
७ हे पियारे तारणहार- हम में जैसे परिवार ।
रह जब तक न तेरे पास- स्वर्ग में पावेंगे निवास ।।
#### 183 (१८३)
*“Let saints on earth in concert sing.”*
*C. M. -- French Dundee or St. Anne.*
१ गीत गावें संत इस जगत के
और स्वर्ग के संत के साथ
कि दास हमारे राजा के
सब होते एक ही जात ।।
२ हम उसमें एक घराना हैं
इस लोक और उसके भी
पर अभी अलग होते हैं
मृत्यु के कारण ही ।।
३ एक सेना जीवित ईश्वर की
हम उसके वश में हैं
कुछ लोग हैं उतरे पार नदी
कुछ अब उतरते हैं ।।
४ इस पल भी बहुत उसके दास
उस लोक में जाते हैं
और बहुत आके नदी पास
विश्राम को ताकते हैं ।।
५ नित अगुवा हे प्रभु हो
और दिन में मृत्यु के
विभाग कर यर्दन नदी को
और हमें स्वर्ग में ले ।।
#### 184 (१८४)
*“The church's one Foundation.”*
*7. 6. 7. 6. 7. 6. Aurelia.*
*SAMUEL J. STONE, 1839-1900.*
*Chord - D | S- "---"/M.Ballad | T- "---"/ 084-090*
१ नेव सारी मंडली ही की
है यीशु प्रभु नाथ
वह नई सृष्टि उसकी
वचन और जल के साथ ।
वह उसे ढूँढ़ने आया
कि उसकी दुलहिन हो
अपना ही रक्त बहाया
उसे मोल लेने को ।।
२ हर देश से चुनी हुई
यह मंडली एक ही है
एक उसके त्राण की झंडी
एक प्रभु एक आश्रय ।
एक नाम की स्तुति करती
एक भोज को खाती भी
एक आस की बाट वह जोहती
सब शोभा है उसकी ।।
३ जो लोग चिढ़ाते देखते
वह कैसी निन्दित है
उसमें है फूट बखेड़े
वह अति क्लेशित है
पर तौ भी संत लोग जाग के
“कब लों” पुकारते हैं
अब दुःख के दिन जल्द बीतते
दिन सुख के आते हैं ।।
४ अब दुःख और पीड़ा होते
और झंझट लड़ने की
पर तौभी हम बाट जोहते
सदा के कुशल की ।
जब तक हमारी आँखें
न देखे स्वर्ग को
और मंडली जयवंत होके
विश्राम न पाती हो ।।
५ पर संगति है उसकी
त्रिएक परमेश्वर से
और उनके संग भी रहती
जो चैन को पा चुके ।
है धन्य वे उसही लोक के
उनके सदृश्य हम हों
और ख्रीष्ट के साथ दीन होके
हम रहें सदा लों ।।
#### 185 (१८५)
*“For all the saints.”*
*10. 10. 10. 4.*
*WILLIAM WALSHAM HOW, 1823-93.*
१ हे यीशु हम सराहते तेरा नाम
कारण उन्हों के जो विश्वास को थाम
सो गये और अब करते है विश्राम । हाल्लेलूयाह ।।
२ तू ठहरा उनका बल चट्टान और कोट
प्रधान और प्रभु बैरियों से ओट
तू दुख की रात में रहा उनकी ज्योत । हाल्लेलूयाह ।।
३ सब योद्धा तेरे दृढ़ विश्वस्त रहें
संतों के ऐसे साहस से लड़ें
और उनके साथ जय मुकुट भी पावें । हाल्लेलूयाह ।।
४ हम लोग भी उनकी संगति में
हम अब तक लड़ते वे विश्राम में हैं
हम सब एक हैं कि हम सब तेरे हैं । हाल्लेलूयाह ।।
५ और यदि थकित हो लड़ते रहें
स्वर्ग से हम उनका जय जयकार सुनें
कि मन में साहस हो बल भुजा में । हाल्लेलूयाह ।।
६ अस्त होता सूरज निकट आई शाम
और थोड़ी देर तक योद्धा मन को थाम
तू परादीस में पावेगा विश्राम । हाल्लेलूयाह ।।
७ लो महा तेज से पौ फिर फटेगी
सब संत लोग उठ पावेंगे महिमा
और महिमा का राजा आवेगा । हाल्लेलूयाह ।।
८ धरती के अंत और सागर पार से आ
मुक्त लोग पैठेंगे स्वर्ग में और सदा
गावेंगे धन्य त्रय की महिमा । हाल्लेलूयाह ।।